अंबेडकर और उनका दलित प्रेम

आजादी के समय दलितो की स्थित बहुत खराब थी यह बात सच है लेकिन अगर इसे सच मान लिया तो बाला साहब भीम राव अम्बेडकर इतने बड़े मुकाम तक कैसे पहुंचे , वह पहले आदमी नही थे उनके अलावा बहुत से ऐसे लोग थे जिन्होने कई क्षेत्रों में अपार सफलता हासिल की और मुकाम बनाये। अगर वह दलितों के हितैषी थे तो बौद्ध धर्म क्यों अपनाया वह दलित ही रहते और उनके हक की लडाई करते, किन्तु ऐसा नही किया , उन्होने जो आरक्षण की व्यवस्था बनायी वह दलित पूंजीपतियों तक ही क्यों सीमित है,जो गरीब है उनके लिये क्यों नही है?  ऐसे तमाम सवाल है जो अंम्बेडकर की विचारधारा पर सवाल उठाते है। दलित उनके बारे में एक शब्द नही सुनना चाहते जबकि अन्य लोग जिन्हे उन्होने आरक्षण की वकालत की वह उनका नाम भी लेना पसंद नही करते।आखिर क्यों ? वह दलित थे लेकिन दलित के शुभ चिन्तक थे यह बात आज तक लोगो के जेहन से नही उतर रही ।

अब दलित की परिभाषा पर काम करते है ,दलित वह जो दल में रहते थे और घृणित काम करते थे जैसे मैला उठाना , मल ढोना , चमड़े का कारोबार करना आदि । इसमे से कई ऐसे थे जो यह काम नही करते थे , स्पर्धा जरूर थी लेकिन उनका अपना व्यवसाय था और वह मजे में थे। कुछ पढ़  लिख कर आगे बढ गये और स्पर्धा पार कर अधिकारी बन गये।यह आजादी से पहले भी था और आज भी है । पहले प्रचार में नही था और भूमिका बनाकर प्रस्तुत किया जाता था,  अब सार्वजनिक है।इसमें अंबेडकर ने क्या किया। अगर दल की बात करें तो सभी समूहों का अपना दल है वास्तव में देखा जाय तो अंबेडकर ने दलित को हीन बना दिया। आज समाज का हर वर्ग उन्हें परायी नजरों से देखता है । इसका कारण स्पर्धा में पीछे रहना है।वोट बैक की राजनीति ने उन्हें नौकरी में आरक्षण कम अंक आने पर भी दिला दिया किन्तु उनकी नजरों में गिरा दिया जिन्होंने उनसे साठ फीसदी अंक ज्यादा पाये थे।क्या खच्चर घोड़े की जगह ले सकता है इस बात को चरित्रार्थ किया गया और आज भी किया जा रहा है।जो मेधावी दलित है वह इस बात से परेशान है लेकिन जिन्हें कुछ नही आता वह खुश है कि अंबेडकर ने उनके लिये कर दिया। जबकि सच यह है कि कांग्रेस ने दलितों का वोट लेने के लिये आरक्षण की व्यवस्था सभी जगह दी और आज तक उसका उपभोग कर रहें है जबकि दलित अब उनके साथ नही रहना चाहता उसने सभी दलों में अपनी पैठ बना ली है और अब वह सिर्फ आरक्षण के मुद्दे पर सभी दलों से तालमेल कर रहा है। वोट वह बहुजन समाज पार्टी को देता है या फिर जहां जिस पार्टी से फायदा हो सकता है उसके साथ हो लेता है।

दलितों की बात की जाय तो अंबेडकर ही नही थे जो धर्म बदल गये उनके अलावा कई लाख की संख्या में दलित लोग बौद्ध बने , इसके बाद भारी संख्या में दलित मुसलमान व ईसाई बने । इसके बाद भी दलितों की संख्या कम नही हुई सभी धर्माे में जितने दलित है उससे कही ज्यादा हिन्दू धर्म में है.  वास्तव में यह भी एक रहस्य है अगर उन्हें इस धर्म में मनुवादी विचारधारा के लोग दिखते है तो वह इसे छोड क्यों नही देते। । जैसे आरक्षण के लिये मेवाड के राजपूत मेवाती पठान बन गये , जाठ जठ मुसलमान बन गये उसी तरह दलितों ने धर्म परिवर्तन तो किया लेकिन वहां भी उनका आरक्षण बदस्तूर जारी रहा यानि सभी धर्माे में दलित की जो व्यवस्था है वह दलितों के हाथ ही है और सभी तरफ का लाभ ले रहे है।इसके अलावा असंवैधानिक रूप से इन्हें प्रमोशन में भी आरक्षण मिल रहा है जो गलत है ।इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसे प्रमोशन को निरस्त करने के लिये व लाभ को वापस लेने की बात कही थी लेकिन सवाल यह कि वोट की राजनीति इतनी गंदी है कि बिल्ली के गले में घंटी  बांधे कौन ?

इस गंदी राजनीति पर अब विचार होना चाहिये और वोटबैंक की राजनीति से बाहर निकल कर काम करना चाहिये ताकि देश इनको मुख्य धारा में शामिल कर सके।एक का हक छीनकर, दूसरों को रेवडी की तरह बांटना, देश बांटने के बराबर है अगर इसके लिये उस समय की व्यवस्था दोषी थी तो आज के लिये कौन जिम्ॅमेदार है,इनकी राजनीति भी खत्म होनी चाहिये । अब जबकि देश में असमानता खत्म हो चुकी है , छूआछूत खत्म हो चुका है और लोग एक दूसरे का निवाला खा रहें है तो इस तरह की व्यवस्था को आगे बढाकर आक्रोश पैदा करना कहां तक उचित है। सरकार को इसपर काम करना चाहिये। देश का भला कैसे हो इस मामले पर सभी दलों व पक्षों से बातकर देशहित में निर्णय लेना चाहिये। आजादी के दौर में हालात जैसे भी रहें हो , उस समय जो निर्णय लिये गये उसका प्रतिफल कश्मीर की तरह देश को नही मिलना चाहिये।

2 thoughts on “अंबेडकर और उनका दलित प्रेम

  1. सत्य कहा आपने… समय आ गया है हमे आरक्षण के खिलाफ आवाज उठाना होगा

  2. वास्तव मे आपने लेखनी के माधयम से जो बाते पोषट की है वैसा साहस किसी नेता मे नही दिखता।..आपको धनयवाद ।

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