बांग्लादेश पर नीति स्पष्ट करें सरकार

बाग्लादेश के हिन्दू बांग्लादेश के हिन्दू हैं, भारत के नही। वे वहां अल्पसंख्यक हैं और लगातार बहुसंख्यक समाज की ज्यादती के शिकार हो रहे हैं। हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों से भारत का बहुसंख्यक हिन्दू समाज विचलित है। बांग्लादेश की सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहा है किन्तु हिंदूवादी भारत की सरकार मौन है। सरकार लगता है अब हिन्दू राष्ट्र होने के मुगालते के बाद पड़ौसियों को घुड़की देना भी भूल गयी है।

बांग्लादेश में आज हो रहे घटनाक्रम को देखकर मुझे 53 साल पहले की वे घटनाएं याद आ रहीं हैं जो बांग्लादेश बनने के पहले पाकिस्तान के बंगाल में हो रही थीं। उस दौर में भी तत्कालीन पाकिस्तानी सत्ता ने बंगालियों पर बर्बरता की तमाम हदें तोड़ दीं थीं। पीड़ितों का आर्तनाद सुनकर भारत की तत्कालीन सरकार ने उस समय जो कदम उठाये थे उसके फलस्वरूप ही आज के बांग्लादेश का जन्म हुआ था।

ये हकीकत है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर ज्यादती बांग्लादेश का आंतरिक मामला है लेकिन जब इस घटनाक्रम से भारत का जन मानस उद्वेलित है तो भारत की सरकार को कुछ तो सोचना चाहिए। मुझे लगता है कि जिस तरह से भारत ने अघोषित रूप से बांग्लादेश की निर्वासित प्रधानमंत्री शेख हसीना को भारत में शरण दी हुई है उसी तरह उसे बांग्लादेशी हिन्दुओं पर ज्यादतियों को लेकर बांग्लादेश की मौजूदा अस्थाई सरकार पर दबाब डालकर हिंसा को रोकने के प्रयास करना चाहिए। जरूरी नहीं है कि इसके लिए बांग्लादेश पर हमला किया जाये ,लेकिन बांग्लादेश को घुड़की तो दी ही जा सकती है।

भारत में चौतरफा धर्मध्वजाएं लेकर मार्च करने वाले मठाधीशों को भी इस मुद्दे पर सरकार पर दबाब डालना ही चाहिए। बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं के ऊपर जिस तरह का अत्याचार हो रहा है, वो साफ़ तौर पर सत्ता पोषित है। ये सब करने की हिम्मत बांग्लादेश की सत्ता में कहाँ से आयी होगी इसका अनुमान लगाया जाना चाहिए। असहिष्णुता और नफरत की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। हमारे यहां पिछले एक दशक से जिस तरह से सत्तापोषित नफरत फल-फूल रही है ठीक वैसे ही हालात बँगला देश में हैं, और शायद इसी लिए भारत सरकार इस मामले में हस्तक्षेप करने का नैतिक बल खो चुकी है।

हैरानी की बात ये है कि भारत की जो सरकार रूस और यूक्रेन युद्ध को रोकने के लिए दखल कर सकती है वो सरकार बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर हो रही ज्यादतियों के मामले में दखल नहीं दे पा रही है। बांग्लादेश में इस समय सत्ता की बागडोर जिन हाथों में है उन हाथों में शांति का नोबुल पुरस्कार भी आ चुका है, फिर भी वे हाथ अपने यहां साम्प्रदायिक हिंसा को नहीं रोक पार रहे हैं।

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