स्वास्थ्य नीति- नीयत – रणनीति, पुनर्विचार की जरूरत (3)

सरकार ने उठाये कदम

  • सरकार ने नई योजना में करीब 6 नये एम्स बनाने की घोषणा की है|
  • 2017 के बजट में प्रतिवर्ष 5000 सीटों की व्यवस्था बनाए जाने का प्रस्ताव किया है|
  • औषधि क्षेत्र में जेनेरिक दवा को बढ़ावा देने हेतु जेनेरिक दवा केंद्र खड़े किए हैं ताकि दवाओं पर होने वाले खर्च में राहत मिले|
  • प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान 2016 के तहत गर्भावस्था के दौरान और बच्चे को जन्म देते समय माता की मृत्यु दर और शिशु की मृत्यु दर को कम करना है एवं शिशु जन्म को एक सुरक्षित प्रक्रिया बनाना है|
  • मिशन इंद्रधनुष के अंतर्गत 7 टीकों की योजना बनाई गई है जिसमें डिप्थीरिया, बलगम, टिटनस, पोलियो, तपेदिक,खसरा, हेपेटाइटिस बी जैसी बीमारियां हैं। 
  • पोषण अभियान में  बच्चों, बालिकाओं, गर्भवती महिलाओं में पोषण की कमी को सुधारना है|
  • प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के अंतर्गत गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं को स्वास्थ्य युक्त रखने की योजना है|
  • आयुष्मान भारत (प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना) के अंतर्गत गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर करने वाले परिवारों को ₹500000 का हेल्थ कवरेज दिया जाएगा|
  • 800 दवाओं की कीमतों में कमी लाई गई|

वास्तविकता

  • प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी की पैरवी की गई है जिससे लूटमार अधिक बढ़ेगी|
  • स्वास्थ्य राज्य का विषय है इसलिए केंद्र की स्वास्थ्य योजनाओं में सबसे बड़ी दिक्कत राज्य और केंद्र के बीच सहमति की कमी होती है|

  स्वास्थ्य संकट की वजह _

  • बढ़ती जनसंख्या- जनसंख्या के कारण , खाद्य समस्या, कुपोषण, प्रति व्यक्ति निम्न आय, कीमतों में वृद्धि जैसी समस्याएं उभर कर सामने आती हैं|
  • प्रदूषण – साल 2017 में वायु प्रदूषण के कारण होने वाली बीमारियों से 12 लाख भारतीयों की मौत हो गई है| WHO की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में 14 भारत के हैं| भारत में करीब 66 करोड़ लोग ऐसी जगहों में रहने को मजबूर हैं जहाँ हवा में प्रदूषण की मात्रा राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है|
  • गरीबी- गरीबी के कारण स्वास्थ्य इलाज पर व्यक्ति खर्च नहीं कर पाता है|
  • खाद्य सुरक्षा – गुणवत्ता युक्त भोजन की कमी की वजह से अनेक लोगों को बीमारी होती है|
  • डॉक्टरों अस्पतालों की कमी|
  • खर्चीला इलाज – भारत में दवाओं की कीमत दुनिया के देशों की तुलना में ज्यादा है|
  • सरकारी योजनाओं का अप्रभावी होना |
  • झोलाछाप डॉक्टर –  एक गैर सरकारी संगठन के मुताबिक भारत में एलोपैथिक डॉक्टर के तौर पर प्रैक्टिस करने वाले एक तिहाई लोगों के पास मेडिकल की डिग्री नहीं है|
  • घटिया दवाएं – सरकारी अस्पतालों में मिलने वाली 10 फीसदी दवाइयां घटिया किस्म की होती हैं| सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक 0.23% दवाइयां नकली पाई जाती हैं |
  • दवा और मशीनरी बनाने वाली कंपनियों पर नियंत्रण की जरूरत है| देश में सिरिंज बनाने की लागत ₹2 आती है लेकिन एक मरीज को इसकी 5 गुना तक ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है | कई रिपोर्ट बताती हैं कि मरीजों से अधिकांश दवा कंपनियां लागत मूल्य की तुलना में 3 गुना तक ज्यादा पैसा वसूलती हैं| मरीजों को घुटने प्रत्यारोपण या हिप इम्प्लांट प्रक्रिया में ₹9000 की जगह 1.25 लाख रुपए वसूले जाते हैं| सरकार की  नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी ने हृदय में लगने वाले स्टंट की कीमत ₹7260 प्रति यूनिट और बायोडिग्रेबल के लिए ₹29600 तक कीमत तय की है।  पहले बायोडिग्रिएबल स्टंट की  कीमत दो से 3 लाख रूपये वसूली जाती थी| भारत में स्टंट बाजार का व्यवसाय करीब 3500 करोड़ रुपए सालाना बताया जाता है| इसके करीब 60% हिस्से पर विदेशी कंपनियों का कब्जा है| दवा निर्माता कंपनी के साथ साठगांठ करके महंगी से महंगी व कम लाभकारी दवा देकर मरीजों से पैसा इतना ऐसी नीति स्वास्थ्य क्षेत्र में चल पड़ी है|

अफसरशाही और आरोग्य तंत्र

राज्यों में स्वास्थ्य महकमे में प्रमुख सचिव, उप सचिव, आयुक्त के अलावा केंद्र प्रवर्तित आयुष्यमान, एड्स, स्वास्थ्य मिशन सब के अलग-अलग निदेशक हैं| सभी पदों पर आईएएस ही तैनात हैं| अस्पताल का अधीक्षक या डीन डॉक्टर होता है| अस्पताल की आवश्यकता डॉक्टरों को ज्यादा मालूम होती है लेकिन स्वास्थ्य की जानकारी न रखने वाले आईएएस उस पर निर्णय लेने का अधिकारी है जिसके चलते अनेक बार फाइलें मंत्रालय में लटकी रहती हैं |

देश में अभियांत्रिकी सेवा का संवर्ग है उसी तर्ज पर अखिल भारतीय चिकित्सा संवर्ग का गठन हो |

देश में करीब 14 लाख  नर्सों की आवश्यकता है | डॉक्टर के ऑपरेशन करने के पश्चात मरीज की देखभाल अधिकतम नर्स ही करती हैं| अलग अलग राज्यों में नर्सों की स्थिति अलग अलग है | उनकी सेवा की शर्तें, वेतन, भत्ते, अलग अलग  होने के कारण दिक्कतें रहती हैं|

सभी जिला अस्पतालों को मेडिकल कॉलेज में तब्दील किया जाए | एकीकृत आरोग्य विभाग के अधीन चिकित्सा , स्वास्थ्य और पोषण मिशन का समावेश किया जाना चाहिए | फिलहाल केंद्र, राज्य, रेलवे, ईएसआई, लेबर, अर्धसैनिक बल आदि के अलग अलग अस्पताल और परिचालन नियम हैं|  

स्वास्थ्य बीमा घोटाला तंत्र

अभी कुछ समय पूर्व उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में स्वास्थ्य बीमा योजना से गरीबों का इलाज भले ही न किया गया हो लेकिन जिन निजी अस्पतालों को स्वास्थ्य बीमा योजना उपलब्ध कराई गई है वहां के संचालकों ने बिचौलियों के माध्यम से कार्ड धारकों से सांठगांठ करके बगैर इलाज किए लाखों रुपए निकाल लिए|  

उत्तराखंड में 123 मरीजों को इलाज किए बिना एक अस्पताल ने केंद्रीय आयुष्मान योजना के अंतर्गत लाखों डकार लिए |

बीमा योजना ‘बीमा कंपनियों’ को अपना बाजार बनाने और अपने ब्रांड के बारे में जागरूकता फैलाने का अवसर दे रहे है| निजी अस्पतालों के लिए उनके मरीजों की संख्या बढ़ाना और उनके ग्राहकों की संख्या बढ़ाना बीमा आधारित प्रणाली की समस्या है| बाजार की मांग और आपूर्ति के आधार पर स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता को परिभाषित करना भी एक समस्या ही है|

अस्पताल में मरीजों पर होने वाले खर्च तो बीमा कवर के अंतर्गत आ जाता है पर अस्पताल से मरीज ठीक होने के बाद उस पर होने वाला दवाई खर्च सम्मिलित ना होने के कारण मरीजों को काफी आर्थिक समस्या का सामना करना पड़ता है| देश में करीब 27 स्वास्थ्य बीमा कंपनियां कार्यरत हैं |

आजकल प्राइवेट अस्पतालों में किडनी, लीवर प्रत्यारोपण और हार्ट संबंधी बीमारियों का इलाज कराने जब मरीज जाता है तो वहां आने वाले खर्चे के संबंध में शब्द प्रयोग करते हैं कि ‘हमारा इतना पैकेज’ है यह शब्दावली इस सोच को बताती है कि अस्पताल का उद्देश्य सेवा नहीं मेवा कमाना है|

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