सम्प्रदायक हिंसा बांग्लादेश में हो या किसी और देश में आसानी से रोकी भी नहीं जा सकती। हमारे यहां मणिपुर में तो साम्प्रदायिक हिंसा को डेढ़ साल हो चुके हैं। जब हम मणिपुर को नहीं सम्हाल पा रहे तो कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि बांग्लादेश अपने यहां अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर होने वाली हिंसा को सम्हाल लेगा ? साल भर पहले तक बांग्लादेश भारत का प्रिय मित्र था। बांग्लादेश की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती शेख हसीना तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के समय उनके शपथ ग्रहण में शामिल होने दिल्ली भी आयीं थीं, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी को बांग्लादेश आने का निमंत्रण भी दिया था, लेकिन वे शेख हसीना के प्रधानमंत्री रहते बांग्लादेश जा नहीं पाए। अब तो बांग्लादेश जाने कि कोई सूरत भी नहीं है।
बांग्लादेश में शेख हसीना का तख्ता पलट होने के बाद अंतरिम सरकार से भारत की बन नहीं पायी ,उलटे भारत-बांग्लादेश के संबंधों में कड़वाहट शुरू हुई और अब चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ़्तारी के बाद दोनों देशों के बीच काफ़ी तल्ख़ कूटनीतिक भाषा का इस्तेमाल हो रहा है।बीते दिनों बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के कानूनी सलाहकार आसिफ नज़रुल तो कह चुके हैं की ”भारत को ये समझना होगा कि ये शेख़ हसीना का बांग्लादेश नहीं है.’। अब पता नहीं की भारत आसिफ नजरुल की बात समझा है या नहीं ? बावजूद इसके भारत सरकार ने शेख हसीना को बांग्लादेश कि मौजूदा सरकार के सुपुर्द नहीं किया है। रार की असली वजह शायद यही है।
हमें याद रखना चाहिए कि भारत और बांग्लादेश चार हज़ार किलोमीटर से ज़्यादा लंबी सीमा साझा करते हैं और दोनों के बीच गहरे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रिश्ते रहे हैं। बांग्लादेश की सीमा भारत और म्यांमार से लगती है लेकिन उसकी 94 फ़ीसदी सीमा भारत से लगती है इसलिए बांग्लादेश को ‘इंडिया लॉक्ड’ देश कहा जाता है। इतना ही नहीं बीते कुछ सालों में बांग्लादेश, भारत के लिए एक बड़ा बाज़ार बनकर उभरा है। दक्षिण एशिया में बांग्लादेश भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है और भारत एशिया में बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है। वर्ष 2022-23 में बांग्लादेश भारत का पांचवां सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार बन गया। वित्त वर्ष 2022-23 में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 15.9 अरब डॉलर का था।
अब भारत के सामने एक ही विकल्प है कि भारत बांग्लादेश को अपना भूभराकर स्वरूप दिखा हड़काये, पाबंदियां लगाए। अंतर्राष्ट्रीय दबाब बनाये, अन्यथा बांग्लादेश भी पाकिस्तान के बाद भारत का एक स्थाई दुश्मन बन जायेगा। बांग्लादेश की मौजूदा सत्ता का झुकाव इस समय भारत के बजाय चीन की और है, तय है कि बांग्लादेश इसी लिए भारत के दबाब में आ नहीं रहा है।भारत को बांग्लादेश के मौजूदा शासकों को अतीत की याद दिलाना चाहिए। यदि भारत की मौजूदा सरकार बांग्लादेशी हिन्दुओं की हिमायत करने में नाकाम रही तो आप तय मानिये कि वो भारत के हिन्दुओं के दिलो दिमाग से भी उतर जाएगी। पहले से विदेश नीति के मोर्चे पर हिचकोले खा रहे भारत के लिए ये एक मौक़ा है जब वो अपना वजूद प्रमाणित कर सकता है। देखिये आने वाले दिनों में बांग्लादेशी हिन्दू राहत की सांस ले पाते हैं या नहीं ?